महफ़िल में आज फिर छिड़ा था ज़िक्र तेरा
आज फिर हम ख़ामोश और शर्मिन्दा होकर लौटे हैं ।
तेरे लिए जो करते थे इबादत नहीं छोड़ी,
तुझे औरों में ढूँढने की आदत नहीं छोड़ी
लाइफ़ ना रही “Social” बिल्कुल भी
जब से इश्क़ के “गणित” में पड़ गए ।
मोहब्बत है एक क़र्ज़ अनमोल
लेकर इसे चुकाता है कोई कोई।
उसे दूर तलक ढूँढते ढूँढते
कितने लोग गुज़र गए पास से …
एक मशवरा है
लेकिन बर्खुरदार
आएगा समझ तुम्हें लुट जाने के बाद ही …
छोड़ दे ये इश्क़, क़सम से बड़े घाटे का सौदा है ।