आईने से कर बात कभी
ख़ुद से कर मुलाक़ात कभी
क़िस्मत को कोसते जी रहा है
और मर जाएगा यूँ ही इक दिन रो रोकर
क्यों रह गया है पीछे
क्या कमियाँ है तुझमें
हो खड़ा और
मर्दों की तरह ख़ुद से कर स्वालात कभी
आईने से कर बात कभी
ख़ुद से कर मुलाक़ात कभी
आईने से कर बात कभी
ख़ुद से कर मुलाक़ात कभी
क़िस्मत को कोसते जी रहा है
और मर जाएगा यूँ ही इक दिन रो रोकर
क्यों रह गया है पीछे
क्या कमियाँ है तुझमें
हो खड़ा और
मर्दों की तरह ख़ुद से कर स्वालात कभी
आईने से कर बात कभी
ख़ुद से कर मुलाक़ात कभी
बड़ी ही बेसब्री से करते रहे इंतज़ार जिसका बचपन में
पहुँच कर उसी बेरहम जवानी में
अब हम अपने बचपन को तरसते हैं
बेरहमी की सभी हदें कर दी हैं पार
मेरा दिल तोड़ने में उसने
लगता है बेहतरीन शायरों में होगा अब नाम मेरा
कैसे करूँ ब्याँ कि कितना ग़ज़ब था अंदाज़-ए-इल्ज़ाम उनका
कि ख़ुद के ही ख़िलाफ़ हँस कर गवाही दे दी हमने
रोज़ लिखता हूँ नज़्म नई
मगर वजह बस वही एक पुरानी है
टूट कर चाहा जिसे तोड़ गया ग़रूर वही
अपनी भी यारों तुम्हारे जैसी ही वही इश्क़ कहानी है
तुझे याद नहीं आती मेरी
कोई बात नहीं
मुझे भी कहाँ अब मेरा ख़याल आता है
क्यों छोड़ा तूने
छोड़ा किसके लिये
ये सब रह गया इक उम्र पीछे
जब से घेरा है ज़िम्मेदारियों ने
अब ज़हन में कहाँ
ख़ुद के लिए कोई ख़याल आता है
तुझे याद नहीं आती मेरी
कोई बात नहीं